दीप जल रहा

January 12, 2010

दीप जल रहा

दीप जल रहा सदियों से भारत के घर में,
त्रेता  से  आरम्भ आह नेता के घर में।
दीप     जल   रहा।
स्नेह पल रहा।
प्रजातंत्र पच्चास पार है नहीं पुराना,
देश   अभी  सोने  की   चिड़िया   और   सुहाना ,
मोह पल रहा। 
दीप  जल रहा।
‘दिया’ दिया उत्सर्ग स्नेहभर क्रान्तिकार ने,
महावीर      गौतम    गाँधी    के   विपुल    प्यार   ने,
पुण्य पल रहा।
दीप   जल     रहा।
मूल्य     बदल     डाले     हमने     सारे     के     सारे,
इससे हुआ इजाफा घर में और हुए लाखों के वारे,
ह्रदय हिल रहा।
राज    चल       रहा।
दीप     जल     रहा।
दीप  मालिका  जन  गण  मन  की करे आरती,
अमा अन्धेरी, दूर छिपी आलोक भारती,
सत्य गल रहा।
वोट   पल  रहा।
दीप   जल  रहा।


सुरसत माता

July 10, 2008

(राजस्थानी)
सुरसत माता

सुरसत माता सुमत दिरावो
ज्ञान बढावो
लगन जगाओ
सुरसत माता अग-जग निरखो
पीड़ा परखो
करुणा सरसो
सुरसत माता आखर बरसो
सबदां परसो
सिरजन दरसो
सुरसत माता बोली वर द्यो
मीठो सुर द्यो
झोळी भरद्यो
सुरसत माता कलम सुघड़द्यो
मसि निरझर द्यो
परहित कर द्यो


दीप जल रहा

July 10, 2008

दीप जल रहा

दीप जल रहा सदियों से भारत के घर में,
त्रेता  से  आरम्भ आह नेता के घर में।
दीप     जल   रहा।
स्नेह पल रहा।
प्रजातंत्र पच्चास पार है नहीं पुराना,
देश   अभी  सोने  की   चिड़िया   और   सुहाना ,
मोह पल रहा। 
दीप  जल रहा।
‘दिया’ दिया उत्सर्ग स्नेहभर क्रान्तिकार ने,
महावीर      गौतम    गाँधी    के   विपुल    प्यार   ने,
पुण्य पल रहा।
दीप   जल     रहा।
मूल्य     बदल     डाले     हमने     सारे     के     सारे,
इससे हुआ इजाफा घर में और हुए लाखों के वारे,
ह्रदय हिल रहा।
राज    चल       रहा।
दीप     जल     रहा।
दीप  मालिका  जन  गण  मन  की करे आरती,
अमा अन्धेरी, दूर छिपी आलोक भारती,
सत्य गल रहा।
वोट   पल  रहा।
दीप   जल  रहा।


मैं शिक्षक हूँ नई सदी का

July 4, 2008

मैं शिक्षक हूँ नई सदी का
नये सिरे से बात करुँगा,
जिन बच्चों में प्रतिभा पावन
उनके सिर पर हाथ धरुँगा।

मेरे पास माप हैं काफी
पहले प्रतिभा तोल करुँगा
भर्ती की गुंजाइश होगी
फिर प्रवेश का मोल करुँगा।

कोई भी अभिभावक आये
भेदभाव की बात न होगी।
पहले आये, पहले पाये
सिवा फीस के बात न होगी।

फीस जमा होने पर सबको
लिट्रेचर भेजा जायेगा,
नियम उपनियम शर्त सभी का
ब्यौरा भी भेजा जायेगा।

अभिभावक यदि अनपढ़ हो तो
किसी पठित से पढवा सकते,
कुछ दिन तक तो छूट रहेगी
फिर शर्तों में आ-जा सकते।

बच्चों को इस नये स्कूल में
नई ड्रेस में आना होगा,
नई किताबें, नया पाठ्यक्रम
‘बिग’ बस्तों को लाना होगा।

अभिभावक को छूट रहेगी
भारी बस्ते वे खुद लायें,
बच्चे यदि पैदल न आयें
टैम्पो में उनको बिठलायें।

यदि टैम्पो भी न आता हो
स्कूल-बस्स की फीस चुकायें,
स्कूल-बस्स यदि लेट चले
उस दिन बच्चों को न भिजवायें।

स्कूल ड्रेस और पाठ्यपुस्तकों
की दुकानेण निश्चित होंगी,
बच्चा घर पर समझायेगा
सबकी दरें सुनिश्चित होंगी।

इस मसले पर कोई शिकायत 
मैं किससे भी नहीं सुनूँगा।
जो बच्चे को टिप-टा‌प लाये
उसी शख्स से बात सुनूँगा।

विद्यालय का भवन
अभी छोटा रक्खूंगा।
कुछ महीनों तक इसे 
किराये पर रक्खुंगा।

फीस बढ़ाकर फिर
इसको तो शिफ्ट करुंगा।
नया भवन बनवाकर
उसको गिफ्ट करुंगा।

मेरी टेबल के शीशे के
नीचे मानचित्र है।
नये भवन की हर सुविधा
का ध्यान-चित्र है।

विद्यालय का स्टाफ
सुपर प्रशिक्षित होगा,
वेतन उनका फीस मुताबिक
निश्चित होगा।

एक पार्टनर यह सारा
इन्तजाम करेगा,
लेखाविज्ञ रात-दिन
बैठा काम करेगा।

हर बच्चे का बायो-डेटा
सयलभ रहेगा,
सब पर साइन अभिभावक 
का साथ रहेगा।

प्रोग्रेस भी बच्चों की
सबको विदित रहेगी,
अभिभावक के हस्ताक्षर 
की सनद रहेगी।

कोई भी अधिकारी आये
जाँचे परखे,
सभी मुकम्मिल
अभिलेखों को देखे-निरखे।

विद्यालय का नाम
मान्यता में अंकित है,
अभिलेखों में सभी जगह
सुन्दर टंकित है।

कुछ लोगों को लगे
अटपटा नाम स्कूल का,
तो बस काफी ‘इंगलिश-मीडियम”
नाम स्कूल का।

इस माध्यम से बच्चे सीखें
अभिभावक भी सीख सकेंगे,
बच्चों की टिट-बिट गिट-पिट
पाड़ोसी भी सीख सकेंगे।

अन्य विषय भी साथ चलेंगे
पर इंगलिश तो सबसे ऊपर,
बच्चों को संस्कारित करना
इसके बल पर इसके ऊपर।

सिस्टम बदल-बदल कर रक्खूं
‘मांटेसोरी’ ‘कींडर गार्टन’
हर व्यक्ति को लगे
इस तरां नाम ‘मोडरन’।

‘नरसरि, के॰ जी॰
मार-पीट बरदाश्त करेगी,
नन्हीं पीढ़ी नते गुरु की
‘विद्या-पोट’ स्वीकार करेगी।

अभिभावक अपने धन्धे में
स्वस्थ रहेंगे,
चार घड़ी की बक-झक से
निश्चिन्त रहेंगे।

नई सदी में नये रास्ते
पास हुआ, विद्यालय नाम,
फेल हुआ तो और खुले हैं
भर्ती के अनगिन आयाम।

अभिभावक विश्वास धारलें
बालक कम्प्यूटर जानेगा,
कपई चाहे अड़े सामने,
उसका तो लोहा मानेगा।

अभी-अभी तो शुरुआत है
सोच समझकर भार उठायें,
तुरत-फुरत लें नये फैसले
आगे बढ़कर कदम उठायें।


उठो

June 21, 2008

                     उठो
उठो नवीन राग से जगा रही खड़ी उषा।
उठो नवीन चेतना संदेश दे दशों दिशा।

खिले अरुण कमल वरा मृणालिनी वसुन्धरा।
प्रभात मुक्त हास से आकाश को सजा रहा।

उठो समीर शंखनाद युद्ध गान गा रहा।
अतीत की मशाल लो भविष्य है बुला रहा।


परिचय

June 16, 2008

शेरसिंह बीदावत (राठौड़)
(मानसिंहोत खँगारोत)
पिताः- स्व॰ ठा॰ नारायणसिंह बीदावत।
माताः- स्व॰ श्रीमती लाडकँवर।
सहधर्मिणीः- श्रीमती पुष्पा, सेवानिवृत्त वरिष्ठ अध्यापिका।
जन्म गाँवः- जासासर तहसील चूरु, जिला चूरु (राजस्थान)।
जन्म तिथिः- ५ मार्च १९३५ ई॰।
शिक्षाः- एम॰ए॰ (हिन्दी), पीएच॰डी॰ (शिक्षा)।
विषयः- “A study of Academic Under- achiievment among students” राजस्थान विश्वविद्यालय १९७६ ई॰।
राज्य सेवाः- राजस्थान शिक्षा विभाग में अनवरत ४२ वर्ष का सेवाकाल।
स्वैच्छिक सेवा निवृत्तिः- १९९२ ई॰।
लेखनः- १॰ हिन्दी-राजस्थानी काव्य संग्रह “निर्बन्ध” १९७४ ई॰ में।
२॰ “वचनसिद्ध अवधूत श्री भानीनाथजी” १९९९ ई॰ में।
३॰ ऐतिहासिक आलोक में “जोगमाया श्री करणीजी” २००१ ई॰ में।
४॰ “भारतीय शिक्षा का परिदृश्य” २००३ ई॰ में।
५॰ काव्य संग्रह “बदलाव के स्वर” २००३ ई॰ में।
६॰ “सकलगुणनिधान श्रीराम-भक्त हनुमान” २००५ ई॰ में।
सम्पादनः- “मुनियों के मंगलकारी वचन” १९८९ ई॰ में तथा मुकनसिंह सैनाली कृत “मोहरसिंघजी राठैड़ री वेली” १९९६ ई॰ में।
लगभग २५ शोधपूर्ण, समीक्षात्मक एवं साहित्यिक निबन्ध प्रकाशित।
शिक्षा विभागीय प्रकाशनों एवं संस्थागत पत्र-पत्रिकाओं का प्रणयन एवं सम्पादन।
सेवा सम्मानः- जिला स्तर पर शैक्षिक कार्यों के लिये जिला प्रशासन द्वारा तीन बार सम्मानित।
साहित्यिक सम्मानः- हिन्दी साहित्य संसद, चूरु द्वारा विशिष्ट साहित्यकार सम्मान (हिन्दी दिवस १४ सितम्बर २००२ ई॰)
स्थायी पताः-
बीदावत भवन, शेखसरिया कुआँ के पास
चूरु (राजस्थान) ३३१००१
दूरभाषः ०१५६२-२५०१६७


शिशु का स्वरुप

June 16, 2008

शिशु का स्वरुप
शिशु सुन्दर, सरल, निपट निश्छल।
मनु की निर्मिति का प्रथम पुष्प।

सर्जन की निर्मल अमिय आभ।
यह नहीं मनुज की निरी उपज।
यह नहीं मात्र कलि का कल्मष।
यह तो विराट का चिदानन्द,
सृष्टि के स्वर का अमिट छन्द।
शिशु है मानव, सर्वस्व निकष।
शिक्षक सेवा का मधुर हास।
इसका पोषण संसृति विलास।
इसका तिषण है युग विकास।
इसका संरक्षण राष्ट्र धर्म।
इसका हंसना जग का हुलास।
शिशु है समष्टि का सौम्य तिलक।
इसका अभिवादन राष्ट्र नमन।
शिशु के दुलार की शुभ्र ललक
बन जाय राष्ट्र का पुण्य कर्म।
मानव संस्कृति फिर चहक उठे
भन विश्व धर्म शुचि शुभ्र कर्म।

 

“बदलाव के स्वर” से साभार